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Lord Hanuman

Lord Hanuman

श्री हनुमान जी

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ॐ हं हनुमते नमः॥ ॐ मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्री-राम-दूतं शरणं प्रपद्ये॥ श्री हनुमान जी को भक्ति, शक्ति, साहस, और निस्वार्थ सेवा का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। वे भगवान राम के परम भक्त हैं, और उनका जीवन यह सिखाता है कि असली शक्ति वह होती है जो किसी अच्छे उद्देश्य के लिए उपयोग की जाए। हनुमान जी का स्मरण मन में विश्वास, आत्मविश्वास, और सुरक्षा की भावना लाता है। हनुमान जी दिखाते हैं कि भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है हृदय को शुद्ध रखना, अहंकार पर नियंत्रण करना, और निस्वार्थ भाव से सेवा करना। उनके पास अपार शक्ति थी, फिर भी वे कभी अभिमान नहीं करते थे। वे हमेशा विनम्र रहे और हर कार्य को भगवान राम की सेवा मानकर करते थे। हनुमान जी को संकटमोचन भी कहा जाता है, यानी वे जो कठिनाइयों को दूर करते हैं। अनेक भक्तों का विश्वास है कि भय, तनाव, या भ्रम के समय हनुमान जी का स्मरण मन को स्थिर कर देता है। हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ आंतरिक शक्ति बढ़ाने और नकारात्मकता से दूर रहने के लिए किया जाता है, क्योंकि यह साहस और सकारात्मक ऊर्जा लाता है। हनुमान जी की कथा यह भी सिखाती है कि कभी-कभी हम अपनी क्षमताओं को भूल जाते हैं। जैसे जाम्बवान ने हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण कराया, उसी प्रकार हनुमान जी की भक्ति हमें याद दिलाती है कि हम भी कठिन समय में साहस और धैर्य के साथ उठ सकते हैं।

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥ जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई। सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥ दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥ लंका सो कोट समुद्र-सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥ लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज सवारे॥ लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्राण उबारे॥ पैठि पाताल तोरि जम-कारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥ बाएं भुजा असुरदल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥ सुर नर मुनि आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥ कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥ जो हनुमानजी की आरती गावे। बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥